
दरभंगा।
बिहार के उच्च शिक्षा जगत में शनिवार को एक बड़ी हलचल दर्ज हुई। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय परिसर में जुटे बिहार भर के अतिथि सहायक प्राध्यापकों ने एक स्वर में सरकार को चेतावनी दी —
👉 “हमने सात वर्षों तक विश्वविद्यालयों में पसीना बहाया, अब उम्र के इस पड़ाव पर किनारे नहीं किया जाएगा। सेवा 65 तक मिलेगी, वरना आंदोलन ऐतिहासिक होगा।”
ज्ञापन सौंपा गया — संजय झा के सामने शिक्षकों की पीड़ा
इस मौके पर प्राध्यापक संघ ने राज्यसभा सांसद सह जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा को ज्ञापन सौंपा। शिक्षकों ने कहा कि
प्रो. राम बच्चन राय की अध्यक्षता वाली विधान परिषद शिक्षा समिति ने 65 वर्ष तक सेवा विस्तार की सिफारिश पहले ही कर दी है। बावजूद इसके, चार महीने से फाइल अटकी है।
प्रश्न सीधा है —
👉 “क्या सरकार शिक्षा के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है?”
🔹 प्राध्यापकों की लंबी सूची, एकजुटता का प्रदर्शन
इस ऐतिहासिक मौके पर दर्जनों नामचीन प्राध्यापक मौजूद रहे —
डॉ सुमन कुमार पोद्दार, डॉ अखिलेश कुमार, डॉ सुजीत कुमार झा, डॉ दीपक कुमार झा, डॉ उपेंद्र यादव, डॉ आशुतोष झा, डॉ महेश यादव, डॉ मृत्युंजय मंडल, डॉ राजीव कुमार झा, डॉ मणि शंकर झा, डॉ तारकेश्वर राम, डॉ गोपाल ठाकुर, डॉ वेद प्रकाश झा, डॉ मीरा कुमारी इत्यादि।
वहीं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा से आए प्रतिनिधि मंडल में डॉ राजेश आनंद, डॉ शिवशंकर, डॉ धनंजय राय, डॉ राधिका रमन सिंह, डॉ एसपी राय, डॉ श्वेता, डॉ विशाल, डॉ अमित अंशु, डॉ कंचन कुमारी, डीआर जुगल किशोर जैसे प्रभावशाली शिक्षाविद शामिल हुए।
🔹 संजय झा का आश्वासन — “आपकी लड़ाई मेरी लड़ाई”
संजय झा ने कहा —
“अतिथि प्राध्यापकों का योगदान अमूल्य है। नीतीश कुमार जी के शासन में जिनको नौकरी मिली, उन्हें कभी हटाया नहीं गया। आपकी लड़ाई मेरी लड़ाई है। मैं स्वयं मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से मिलकर इस मुद्दे पर बात करूंगा।”
🔹 आरा से पटना तक पहुंची आवाज़
आरा से आए प्रतिनिधि मंडल ने केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर और विधान पार्षद जीवन कुमार से भी मुलाकात कर सेवा विस्तार का अनुरोध किया। दोनों नेताओं ने तत्काल मुख्यमंत्री को मेल भेजकर मुद्दे पर त्वरित निर्णय का भरोसा दिलाया।
बड़ा सवाल :
क्या बिहार सरकार 65 वर्ष तक सेवा विस्तार की घोषणा कर प्राध्यापकों की उम्मीद बचाएगी, या फिर हजारों शिक्षकों को सड़क पर संघर्ष करने को मजबूर करेगी?
यह आंदोलन अब केवल नौकरी का सवाल नहीं रहा, बल्कि यह बिहार की शिक्षा की साख और विश्वविद्यालयों के भविष्य की जंग बन चुका है।
“शिक्षा का मंदिर अब संघर्ष का अखाड़ा बन गया है” — यही संदेश आज पूरे बिहार ने सुना।