
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। भागलपुर की तंग गली इशाकचक से निकलकर यूरोप की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराने वाली नमिता कुमारी ने न सिर्फ ऊँचाई को मापा, बल्कि उम्मीदों को भी नया आसमान दिया।
16 अगस्त की सुबह थी। घड़ी की सुइयां 5:20 पर रुकी थीं – उस क्षण के लिए जब भारत का तिरंगा माउंट एल्ब्रस की बर्फीली हवाओं में गर्व से लहराया। उस पल, केवल तिरंगा नहीं लहरा रहा था – भागलपुर की एक बेटी का सपना, हौसला और संघर्ष भी शिखर पर पहुंच चुका था।
नमिता, जो इस समय पटना की बिहार ग्रामीण बैंक में सहायक प्रबंधक हैं, ने इस असंभव-से दिखने वाले कारनामे को अपनी लगन और तैयारी से संभव किया। पर्वतारोहण के प्रति उनका समर्पण उन्हें हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट, दार्जिलिंग तक ले गया, जहां उन्होंने खुद को तैयार किया – चट्टानों से लड़ने, बर्फ से जूझने और खुद को हराने के लिए।
सिर्फ एक चढ़ाई नहीं, एक संदेश था ये…
यह चढ़ाई सिर्फ नमिता की नहीं थी – ये हर उस लड़की की थी जो छोटे शहरों में बड़ी ख्वाहिशें पाले बैठी है। यह उस सोच के खिलाफ एक सशक्त उत्तर था जो मानती है कि बेटियां सिर्फ घरों तक सीमित हैं।
नमिता ने युनम पीक से लेकर केदारकंठा तक की कई ऊंचाइयां पहले ही छू ली थीं, लेकिन माउंट एल्ब्रस उनके लिए खास था। एक सुप्त ज्वालामुखी पर चढ़ना, जहां सांसें भी भारी हो जाएं, वहां खड़े होकर देश का झंडा लहराना – यह पल उन्होंने सिर्फ अपनी आंखों से नहीं, दिल से महसूस किया।
“अगर और समर्थन मिले…”
उनकी आवाज़ में गर्व है, लेकिन एक गुज़ारिश भी। वे कहती हैं – “अगर सरकार थोड़ा साथ दे, तो बिहार की बेटियां भी एवरेस्ट की ऊँचाइयों तक पहुंच सकती हैं।”
नमिता मानती हैं कि यह जीत अकेली उनकी नहीं, बल्कि उस सोच की है जो मानती है – सपनों का कोई ज़िपकोड नहीं होता। आज, वह सिर्फ भागलपुर की बेटी नहीं – पूरे बिहार की शान हैं।
मां-बाप के आशीर्वाद, अपनी मेहनत और मजबूत इरादों के सहारे नमिता ने जो मुकाम हासिल किया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रौशनी का रास्ता बन गया है। “जहां रास्ते नहीं होते, वहां निशान बन जाते हैं – और नमिता ने बर्फ की उस चोटी पर अपने हौसले का निशान छोड़ दिया है।”