
स्नान-दान सहित श्रावणी पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन का पुनीत पर्व 09 अगस्त शनिवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष 08 अगस्त शुक्रवार को दिन में 01:40 बजे से पूर्णिमा तिथि लग रही है जो 09 अगस्त शनिवार को दिन में 01:23 बजे तक रहेगी। चूंकि शनिवार को सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में हो रहा है,अतः उदया तिथि को मानते हुए सम्पूर्ण दिन रक्षाबंधन का त्योहार अपनी अपनी परंपरा के अनुसार मनाना उचित होगा। आज ही वेद के विभिन्न शाखाओं के अनुयायी एक साथ मिलकर सबसे पवित्र श्रावणी उपाकर्म विधिवत सम्पन्न करेंगे।
उक्त जानकारी महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने दी।
उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन का त्योहार केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक हीं नहीं है अपितु यह चार वर्णों की अद्वितीय शक्तियों से युक्त व्यक्ति,परिवार,समाज व राष्ट्र रक्षा का आह्वान भी करता है। यह पर्व आत्मबोध एवं आत्मज्ञान का दिन है।
प्राचार्य पाण्डेय ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में एक बार बारह वर्षों तक देवासुर संग्राम होता रहा,जिसमें देवताओं का पराभव हुआ और असुरों ने स्वर्ग पर अधिपत्य कर लिया। पराजित एवं चिन्तित इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के पास गए और कहने लगे कि इस समय न तो मैं यहाँ सुरक्षित हूँ और न ही यहाँ से कहीं निकल ही सकता हूँ। ऐसी दशा में मेरा युद्ध करना ही अनिवार्य है,जबकि अब तक के युद्ध में हमारा पराभव ही हुआ है। इस वार्तालाप को इन्द्राणी भी सुन रही थीं । उन्होंने कहा कि कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा है,मैं विधान पूर्वक रक्षासूत्र तैयार करुँगी,उसे आप स्वस्तिवाचन पूर्वक ब्राम्हणों से बँधवा लीजिएगा। इससे आप अवश्य विजयी होंगे। दूसरे दिन इन्द्र ने रक्षाविधान और स्वस्तिवाचन पूर्वक रक्षाबंधन करवाया जिसके प्रभाव से उनकी विजय हुयी। तब से यह पर्व मनाया जाने लगा।
एक बार भगवान कृष्ण के हाथ में चोट लग जाने से रक्तस्राव होने पर द्रोपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनके हाथ में बाँधा था। श्रीकृष्ण ने उसे रक्षासूत्र मानते हुए कौरवों की सभा में द्रोपदी की लाज बचायी थी।
मेवाड़ की रानी कर्णावती ने भी मुगल शासक हुमायूँ को गुजरात एवं मालवा के शासक के चित्तौड़ पर आक्रमण के विरुद्ध सहायता देने के लिए राखी भेजी थी।
आज के दिन बहन भाई को रक्षासूत्र बाँधती है और भाई बहन की रक्षा का वचन देता है। इस दिन गुरु अपने शिष्यों को,ब्राह्मण अपने यजमानों को एवं प्रजा अपने राजा को रक्षासूत्र बाँधते हैं। इस दिन पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से वृक्षों में भी रक्षासूत्र बाँधने का विधान है। इसके पीछे धारणा है कि वे उनकी रक्षा करें।