
सहरसा (बिहार):
जब संकल्प, साधना और समर्पण का संगम होता है, तब एक सामान्य विद्यार्थी भी असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित कर सकता है। डॉ. सद्दाम हुसैन इसका सजीव उदाहरण हैं। सहरसा जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े जिले से निकलकर उन्होंने शोध एवं अकादमिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ अर्जित की हैं, वह न केवल सराहनीय हैं, बल्कि नवयुवकों के लिए प्रेरणा-स्रोत भी हैं।
डॉ. हुसैन ने राजनीति विज्ञान में स्नातक (2016) तथा परास्नातक (2019) की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। उन्होंने यूजीसी- नेट में तीन बार सफलता प्राप्त कर राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, महिला अध्ययन, गांधीयन पीस तथा मानवाधिकार एवं कर्तव्यों जैसे विषयों में जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) प्राप्त किया। वर्तमान में वे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में राजनीति विज्ञान विभाग के शोधार्थी के रूप में पीएच.डी. शोधकार्य में संलग्न हैं। डॉ. हुसैन का लेखन समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक विषयों को नई दृष्टि प्रदान करता है। उनके नाम 10 से अधिक पुस्तक-अध्याय, 9 शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख, तथा 11 से अधिक सेमिनार प्रस्तुतियाँ दर्ज हैं। प्रमुख लेखों में — “गुट निरपेक्षता और भारत”, “गांधीवादी विचारधारा”, “पंचायती राज में स्थानीय शासन की भूमिका”, “बिहार के विकास में विधानसभा सदस्यों की भूमिका (2005–2020)”, “डॉ. अंबेडकर के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता”। इन लेखों का प्रकाशन प्रतिष्ठित जर्नलों और पुस्तकों में हुआ है जैसे – भारती पब्लिकेशन, शार्प माइंड पब्लिकेशन, रेड’शाइन, शोधमंथन, विजडम हेरल्ड और पारिशीलन।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सशक्त उपस्थिति-देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों में आयोजित संगोष्ठियों में डॉ. हुसैन ने विषय-वस्तु की गंभीरता के साथ भागीदारी की। वे मेघालय, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और बिहार की संगोष्ठियों में निम्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत कर चुके हैं:
पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय प्रशासन,21वीं सदी में बिहार की विकासात्मक चुनौतियाँ, महिलाओं की सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी, डॉ. अंबेडकर के लोकतांत्रिक विचार।
विकास, विषमता और न्याय के संदर्भ में बिहार- शिक्षण एवं नवाचार में दक्षता- डॉ. हुसैन ने आईआईएमटी कॉलेज ऑफ लॉ, नोएडा तथा हाल्दिया प्रौद्योगिकी संस्थान, पश्चिम बंगाल में आयोजित फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम में भाग लिया। इन कार्यक्रमों में उन्होंने शिक्षण में नवाचार, मशीन लर्निंग तथा डिजिटल अनुसंधान पद्धतियों पर उत्कृष्ट प्रशिक्षण प्राप्त किया।शोध विषयों की सामाजिक प्रासंगिकता- उनकी शोध दृष्टि जमीनी हकीकत से जुड़ी हुई है — वह शुद्ध शैक्षणिक चिंतन से आगे बढ़कर समाज के भीतर परिवर्तन की संभावनाएँ तलाशते हैं। उनके शोध में बिहार की राजनीतिक संरचना, नीति-निर्माण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को केंद्र में रखा गया है।
शिक्षाविदों की दृष्टि में- “डॉ. सद्दाम हुसैन का शोध-कार्य न केवल विषय के प्रति उनकी गहराई को दर्शाता है, बल्कि यह भविष्य की बौद्धिक पीढ़ियों के लिए शोध की एक स्पष्ट दिशा भी तय करता है।”
– प्रो. (डॉ.) आर. एन. ठाकुर, पूर्व विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान, दरभंगा विश्वविद्यालय, “वे बिहार की उस नई शैक्षणिक चेतना के प्रतीक हैं जो जड़ों से जुड़कर विश्व से संवाद करती है।”
– डॉ. अनामिका राय, स्त्री अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय
निष्कर्षत: डॉ. सद्दाम हुसैन की शैक्षणिक यात्रा यह दर्शाती है कि सीमित संसाधनों में भी समर्पित अध्ययन, शोध की तीव्र दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता के माध्यम से वैश्विक मंच तक पहुँचा जा सकता है। वे बिहार की बौद्धिक चेतना के उदीयमान प्रतिनिधि हैं, जिनसे आने वाली पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है।