चंपारण की खबर::विश्व प्रसिद्ध संत दाता अब्दुल हलीम शाह का 778 वां उर्स शुरू

Breaking news News बिहार


ऐतिहासिक पांच दिवसीय सद्भावना मेला 9 जून तक चलेगा


मोतिहारी/ राजन द्विवेदी।
जिले के मेहसी में विश्व प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा अब्दुल हलीम शाह चिश्ती का 778 वां उर्स एवं ऐतिहासिक पांच दिवसीय सद्भावना मेला आज 5 जून से प्रारंभ हो गया है, जो 9 जून तक जारी रहेगा। देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं द्वारा चादरपोशी और फातिहा खानी का सिलसिला प्रारंभ हो चुका है। सूफी संतों में आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ धीरे-धीरे उमड़ने लगी है।
सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतज़ाम


पुलिस प्रशासन ने मेले की सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता बरती है। भीड़भाड़ वाले सभी स्थलों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिससे श्रद्धालुओं की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके।
उर्स का ऐतिहासिक महत्व


गद्दीनशीन सूफी सैयद शमीम अहमद चिश्ती के अनुसार, ख्वाजा अब्दुल हलीम शाह चिश्ती का उर्स मुगल काल से निरंतर बकरीद के अवसर पर मनाया जाता रहा है। पिछले 10 वर्षों से वे स्वयं इसकी सरपरस्ती कर रहे हैं, जबकि इससे पहले उनके  बड़े भाई सैयद अंज़ार अहमद, इनके पिता सैयद सगीर अहमद चिश्ती सहित इनके  पूर्वजों द्वारा उर्स का आयोजन किया जाता था।
सैयद शमीम अहमद बताते हैं कि यह मेला इस्लामी महीने ज़िल्हिज्जा की 8 वीं तारीख से 12वीं तारीख तक चलता है। इस दौरान करीब चार से पांच लाख श्रद्धालु हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई -मजार पर हाजिरी लगाते हैं, चादर चढ़ाते हैं और मनोकामनाएं मांगते हैं।
-इतिहास में दर्ज मेहसी और मजार की कथा
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, 1200-1300 ई. के आसपास जब यह इलाका वीरान था और यहाँ आबादी नहीं थी, तब बूढ़ी गंडक नदी के किनारे नावों के सहारे लोग आवागमन करते थे। उसी मार्ग से एक दिन ख्वाजा अब्दुल हलीम शाह चिश्ती का काफिला यहां पहुँचा। मवेशी चरा रहे ग्वालों से उन्होंने दूध मांगा, लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। तब उन्होंने एक विशेष गाय की ओर इशारा कर कहा कि “इससे दूध निकालो, इंशाल्लाह यह दूध देगी।” आश्चर्यजनक रूप से गाय ने भरपूर दूध दिया, जिससे सभी ने तृप्त होकर पिया।
जब सूफी संत ने ग्वालों के मुखिया से उसका नाम पूछा, तो उसने “महेश रावत” बताया। तब ख्वाजा साहब ने आशीर्वाद स्वरूप कहा कि “तुम्हारे नाम से इस स्थान पर एक कस्बा बसेगा।” वही कस्बा आज मेहसी के नाम से प्रसिद्ध है।


मान्यताओं और ऐतिहासिक प्रमाण


ख्वाजा अब्दुल हलीम शाह ने इसी स्थल पर एक कुटी बनाकर जीवन का शेष समय यहीं बिताया। उनकी करामातों की चर्चा आसपास के गाँवों में फैलती गई और लोग दर्शन के लिए यहाँ आने लगे। उल्लेखनीय है कि अबुल फज़ल द्वारा लिखित प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ “आइना-ए-अकबरी” में भी मेहसी और ख्वाजा अब्दुल हलीम शाह चिश्ती के मजार का उल्लेख मिलता है।
भीड़ और श्रद्धालुओं की उम्मीद:
मौलाना शमीम अहमद कादरी के अनुसार, 2024 के उर्स में लगभग 5 लाख श्रद्धालुओं ने भाग लिया था। इस वर्ष भी मौसम अनुकूल होने के कारण भारी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई जा रही है।