होली विशेष::होलिका दहन 2 को मध्य रात्रि तक तो होली चार को मनाना शास्त्र सम्मत

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मंगलवार की संध्या छह बजे से लगेगा चंद्र ग्रहण


मोतिहारी, राजन द्विवेदी।


होली का पर्व दो भागों में विभक्त है- फाल्गुन शुक्लपक्ष पूर्णिमा को सायंकाल के बाद भद्रा रहित शुभ मुहूर्त्त में होलिका पूजन व होलिका दहन तथा चैत्र कृष्णपक्ष प्रतिपदा को रंग-गुलाल आदि से होलिकोत्सव मनाने का विधान है। इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 02 मार्च सोमवार को सायं 05:18 बजे से प्रारंभ हो रही है जो कि 03 मार्च मंगलवार को दिन में 04:33 बजे तक रहेगी। सोमवार को सायंकाल 05:18 बजे से भद्रा भी लग जाएगी जो रात्रि शेष 04:56 बजे तक रहेगी।
            चूंकि होलिका दहन के तीन धर्मशास्त्रीय नियम हैं।  फाल्गुन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि हो,रात्रि का समय हो तथा भद्रा बीत चुकी हो। अतः होलिका दहन की शास्त्रीय मान्यताओं का अनुपालन करते हुए भद्रा मुख का परित्याग कर भद्रा पुच्छ में रात्रि 12:50 बजे के पूर्व होलिका दहन करना उचित होगा। वही चैत्र कृष्णपक्ष प्रतिपदा तदनुसार 04 मार्च बुधवार को रंगोत्सव यानि रंग-गुलाल की होली का पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
यह जानकारी महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने दी।
बताया कि होली राष्ट्रीय एकता,अखंडता,सामाजिक समरसता,सद्भाव व मित्रता का पर्व है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार होली की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। जैमिनीसूत्र के रचयिता ने अपने ग्रंथ में होलिकाधिकरण नामक एक स्वतंत्र प्रकरण लिखकर होली की प्राचीनता को प्रदर्शित किया है। महर्षि वात्स्यायन ने भी अपने कामसूत्र में होलाक नाम से इस उत्सव का उल्लेख किया है। विष्णुपुराण के अनुसार प्रमुख तौर पर यह त्योहार प्रह्लाद से संबंधित है। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व का संबंध काम दहन से भी है। जब शंकर जी ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था। वैदिक काल में इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। खेत से अधकच्चे व अधपक्के जौ,गेंहू,चना आदि अन्न को यज्ञ की अग्नि में हवन करके प्रसाद लेने का विधान समाज में था। इस अन्न को होला कहते हैं। इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। इस पर्व को नव संवत्सर का आरंभ व वसंतागमन के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है।
               प्राचार्य पाण्डेय ने बताया कि होली देवताओं का भी प्रिय पर्व रहा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण ने द्वारिका वासियों,ब्रजवासियों,अपनी रानियों एवं पटरानियों के साथ होली का उत्सव मनाया है। भगवान शंकर ने तो श्मशान की राख से होली खेलकर अपने को कृतकृत्य किया है।
               सूर्य के प्रकाश से अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष तक फैला प्रत्येक रंग विधाता की कल्पना का प्रमाण है। हरा रंग समृद्धि, विकास तथा पुनः निर्माण का उद्घोष करता है, तो पीला या केसरिया कल्पना, ज्ञान व बुद्धि की शक्ति को दर्शाता है। लाल रंग कर्मयोग के उल्लास को झलकाता है,मगर काला रंग तामसिक प्रवृत्ति का प्रतीक है। अतः होली के अवसर पर काले रंग का उपयोग सर्वथा निषेध है। ऐसी मान्यता है कि अट्टहास,किलकारियों तथा मंत्रोच्चार से पापात्मा राक्षसों का नाश हो जाता है। इसलिए होलिका दहन के समय सभी उच्चे स्वर में अट्टहास व किलकारियाँ मारकर होलिका के चारो ओर झूम-झूमकर नृत्य करते हैं। इस दिन आम्र मंजरी तथा चंदन मिलाकर खाने का भी विधान है। 
उन्होंने बताया कि 03 मार्च मंगलवार को भारत में ग्रस्तोदित खण्डग्रास चन्द्र ग्रहण भी लगेगा। जिसका समय सायं 06:00 बजे से 06:48 बजे तक रहेगा। चन्द्र ग्रहण का सूतक 09 घंटा पूर्व से ही लग जाता है।