
सचमुच अमृतकाल में भ्रष्ट्राचार, रिश्वत खोरी,या काला धन को वैधता की मिली मंजूरी।
जहानाबाद (बिहार) से ब्यूरो चीफ मनोहर सिंह का रिपोर्ट।
जहानाबाद -एक यैसी खबर जो सचमुच सोचने पर कर देगा मजबूर।आज हम ऐसे दौर में खड़े हैं जहाँ भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार कहना भी अधूरा सत्य है। जिसे अमृतकाल कहा जा रहा है, वह दरअसल वैध लूट, संगठित भ्रष्टाचार और लोकतंत्र के क्रमिक क्षरण का काल बन चुका है। भारतीय लोकतंत्र जिन मूल्यों—जवाबदेही, पारदर्शिता और जनकल्याण—पर खड़ा था, वे मूल्य आज योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किए जा रहे हैं।
इस व्यवस्था की रीढ़ बन चुका है इलेक्टोरल बॉन्ड—जो काग़ज़ों में पारदर्शिता का प्रतीक है, लेकिन व्यवहार में सत्ता और पूँजी के खतरनाक गठजोड़ की ढाल। इसने काले धन को वैधता दी, कॉरपोरेट्स को संरक्षण दिया और सत्ता को जवाबदेही से मुक्त कर दिया। आज कानून और संविधान से ऊपर वह खड़ा है, जिसके पास सत्ता को खरीदने की क्षमता है।
भ्रष्टाचार अब रिश्वत के लिफ़ाफ़ों में नहीं मिलता। अब वह टेंडर, ठेके और नीतियों के रूप में मौजूद है। लूट अब छिपी नहीं है, बल्कि नीति-निर्माण का हिस्सा है। देश के संसाधन—जमीन, जंगल, खनिज, ऊर्जा—सब कुछ कॉन्ट्रैक्ट्स के ज़रिये कुछ गिने-चुने कॉरपोरेट्स को सौंपा जा चुका है। जनता से वसूली टोल, टैक्स, स्मार्ट मीटर और महँगी सेवाओं के ज़रिये की जा रही है।
स्वास्थ्य सेवा व्यापार बन चुकी है, शिक्षा वसूली की स्कीम। मरीज ग्राहक हैं, माता-पिता मजबूर उपभोक्ता। नकली दवाइयाँ, लुटेरे अस्पताल और महँगी शिक्षा इस अमृतकाल की पहचान बन गए हैं। युवाओं की ज़िंदगी सट्टेबाज़ी ऐप्स की भेंट चढ़ रही है और बदले में अरबों का चंदा सत्ता तक पहुँच रहा है।
पहले सत्ता डरती थी, आज वह मैनेजर बन चुकी है। पहले भ्रष्टाचार शर्म की बात था, आज वह पॉलिसी डिसीजन है। जनता रोती है, तड़पती है, मरती है—और सत्ता कहती है, “सब कुछ नियमों के तहत है।”
यही अमृतकाल है—
जहाँ ज़हर को अमृत कहा जा रहा है
और लूट को राष्ट्रनिर्माण।
