
वैभव गुप्ता।
अखिल भारतीय सोहम महामंडल शाखा रामपुर मनिहारान के तत्त्वावधान में चल रहे सन्त सम्मेलन के तृतीय दिवस में सोहंम पीठाधीश्वर श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में राष्ट्रप्रेम, संस्कृति, शिक्षा और संस्कार की महती आवश्यकता है। इससे जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति हो सकेगी। जीवन में पवित्र आचरण, विचार, आहार , विहार, रहन, सहन शुद्ध हो सकेंगे। शास्त्रों में कहा भी गया है *आचारो परमो धर्म*। और *आचारहीनं न पुनन्ति वेदा:* अर्थात सदाचरण हीन व्यक्ति को वेद भी शुद्ध नहीं कर सकते।इसलिए सही शिक्षा हो शुद्ध संस्कार हो, अपने देश के लिए प्रेम कूट कूट के भरा हो।अपनी भारतीय संस्कृत के प्रति गर्व हो तो हम सर्वश्रेष्ठ बन सकेंगे। *मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्य देवो भव। सत्यं वद । धर्मं चर।* इत्यादि भाव जागृत रहेंगे। रामजी वशिष्ठ और विश्वामित्र से शिक्षित होते हैं और कृष्ण संदीपनी जी से, अर्जुन द्रोण और कृष्ण से सीखते हैं।ध्रुव को अपनी माता से संस्कार मिले थे। स्वामी ने यह भी कहा कि आज सबसे ज्यादा आवश्यकता है बच्चों को राष्ट्रप्रेम सीखने की, अपनी संस्कृति के प्रति जागृत करने की, अच्छी शिक्षा और पवित्र संस्कार देने की। उसके लिए सभी को प्रयासरत रहना चाहिए। बालकों को संस्कारित करने के लिए विशेषरूप से माताओं को संस्कारित होने की आवश्यकता है।माता मदालसा का दृष्टांत देते हुए स्वामी जी ने कहा कि मदालसा ने अपने सभी पुत्रों को संस्कारित करके सदा के लिए भवसागर से मुक्त करा दिया।साथ ही यह भी कहा कि सुभद्रा यदि सोई न होती तो अभिमन्यु चक्रव्यूह से अवश्य पार हो सकता था। जीजाबाई ने शिवाजी को सँस्कारित करके मराठा राज्य को स्थापित कराया l
स्वामी प्रीतमदास ने रामायण के माध्यम से राम की शिक्षा और संस्कारों का वर्णन किया।। स्वामी प्रणवानंद ने बालकों में संस्कारों को सुधारने पर बल दिया। स्वामी अनंतानंद ने बच्चों को संस्कृत भाषा को विशेष पढ़ाने पर जोर दिया। स्वामी नारायणानंद ने मंच का भी संचालन किया।इसके अतिरिक्त गोपालानंद ने ग्रामीणक्षेत्र में शिक्षा और संस्कार के विषय में अनेकों उदाहरण देकर प्रकाश डाला। कृपालु जी महाराज ने शिक्षा के विषय में अपने विचार प्रकट किये l

इस अवसर पर संरक्षक जयराज पंवार, प्रधान कुलबीर सैनी, पंडित दिग्विजय शर्मा, संजय पंवार, काशीराम सैनी, सतवीर चौहान, सुरेंद्र सिंह सैनी, सिंहराज सिंह, नीरज, अनुज सैनी, गोपाल सैनी आदि भक्तों ने संतों को सम्मानित किया और भगवान की आरती की।
